सरकारी जिप्सी में लकड़ी, मोर मौत मामला और टाइगर स्किन केस पर जवाब मांगते रहे ग्रामीण, चुप रहे जिम्मेदार अधिकारी

गरियाबंद।
“अगर सब कुछ नियम के मुताबिक था, तो जवाब देने में परेशानी क्यों हुई?”
यह सवाल अब मैनपुर क्षेत्र में चर्चा का विषय बन चुका है।
21 मई 2026 को बुढ़गेलटप्पा (कालीमाटी) में आयोजित सुषासन तिहार उस वक्त सवालों के घेरे में आ गया, जब मंच पर मौजूद वन विभाग के अधिकारियों से जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने सीधे और तीखे सवाल पूछने शुरू कर दिए।
कार्यक्रम में शासन की योजनाओं की जानकारी दी जा रही थी और प्रशासन के अनुसार शिविर में कुल 1180 आवेदन प्राप्त हुए। लेकिन चर्चा योजनाओं से ज्यादा वन विभाग के जवाबों — और कई मामलों में चुप्पी — की होती रही।
मंच पर SDO एवं एंटी पोचिंग टीम के नोडल अधिकारी गोपाल कश्यप से उस मामले पर जवाब मांगा गया, जिसमें सरकारी जिप्सी वाहन CG 02 8087 में अभ्यारण्य क्षेत्र से लकड़ी लाए जाने का आरोप लगा था।
स्थानीय पत्रकारों द्वारा वाहन रोके जाने के बाद चालक और साथ बैठे लोगों से पूछताछ की गई थी, लेकिन मौके पर स्पष्ट जवाब नहीं मिला। बाद में वन विभाग की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा गया कि जंगल में राष्ट्रीय पक्षी मोर की मौत हो गई थी और अंतिम प्रक्रिया के लिए लकड़ी लाई जा रही थी।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि —
यदि मोर की मौत हुई थी, तो उस समय तत्काल आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
क्या वन विभाग को केवल तब प्रेस विज्ञप्ति जारी करना याद आया, जब मामला मीडिया में उछला?
ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया कि बाद में जारी तस्वीर में राष्ट्रीय पक्षी मोर को कागज में रखे दिखाया गया।
क्या राष्ट्रीय पक्षी के साथ इस तरह का व्यवहार वन विभाग की तय प्रक्रिया का हिस्सा है?
क्या वन विभाग के पास वन्यजीव प्रबंधन और संरक्षण को लेकर कोई मानक प्रोटोकॉल नहीं है?
मामला यहीं नहीं रुका।
सुशासन तिहार के मंच पर बाघ की खाल तस्करी मामले को भी उठाया गया। आरोप लगाया गया कि ओडिशा निवासी जलंधर यादव आरोपी को मैनपुर लाकर रातभर निर्वस्त्र कर प्रताड़ित किया गया।
जनप्रतिनिधियों ने पूछा —
यदि आरोपी दोषी था, तो क्या पूछताछ कानून के दायरे में हुई?
क्या मेडिकल परीक्षण कराया गया?
क्या पूरी कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग हुई?
और यदि आरोप गलत हैं, तो वन विभाग ने अब तक आधिकारिक खंडन क्यों नहीं किया?
इन सवालों पर कार्यक्रम के दौरान गोपाल कश्यप जवाब देने से बचते नजर आए। मंच पर मौजूद ग्रामीण लगातार जवाब मांगते रहे, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे रहे। पत्रकारों द्वारा सवाल पूछे जाने पर भी कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
अब पूरे मामले में कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं —

क्या सरकारी वाहन का दुरुपयोग हुआ?
क्या टाइगर रिजर्व क्षेत्र से लकड़ी लाना नियमों के तहत था?
क्या वन विभाग के डिपो में लकड़ी उपलब्ध नहीं थी?
लकड़ी परिवहन की अनुमति किस अधिकारी ने दी?
मामले में अब तक कितने कर्मचारियों या अधिकारियों पर कार्रवाई हुई?
यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो क्यों?
और सबसे बड़ा सवाल — क्या विभाग सच छिपाने की कोशिश कर रहा है?
सुशासन तिहार आम जनता की समस्याएं सुनने और जवाबदेही तय करने का मंच माना जाता है। लेकिन बुढ़गेलटप्पा (कालीमाटी) में आयोजित इस कार्यक्रम ने खुद वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


