धनोरा के पीपलखुटा में पटेलपारा-पीपलखुटा नाला पर पुल बहा, लोहारपारा नाला भी बना आफत; किसान खुद कर रहे सड़क की मरम्मत, विभाग बेखबर
गरियाबंद। जिले में बीते दिनों हुई भारी बारिश ने एक बार फिर ग्रामीण सड़कों और पुल-पुलियों के रखरखाव की हकीकत सामने ला दी है। नदी-नालों में आए उफान ने कई इलाकों में आवागमन की व्यवस्था को पटरी से उतार दिया है। इसी बीच ग्राम पंचायत धनोरा के आश्रित ग्राम पीपलखुटा से सामने आई तस्वीर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
यहां पटेलपारा-पीपलखुटा नाला पर बना पुल तेज बारिश और पानी के बहाव में बह गया। वहीं लोहारपारा नाला भी उफान पर आने से ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ गईं। करीब 700 की आबादी वाले इस क्षेत्र के लोगों के लिए यह रास्ता महज सड़क नहीं, बल्कि स्कूल, आंगनबाड़ी और खेतों तक पहुंचने की प्रमुख कड़ी है।
पुल बह गया, जिम्मेदारों की नींद नहीं खुली
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बारिश के मौसम से पहले ही ग्रामीण क्षेत्रों की पुल-पुलियों की स्थिति की जांच और जरूरी मरम्मत की जरूरत होती है, तो आखिर जिम्मेदार विभाग ने इस मार्ग की सुध क्यों नहीं ली?
ग्रामीणों के अनुसार धनोरा से पाटियालपारा जाने वाला मार्ग प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बनाया गया था। इस सड़क की आखिरी रिपेयरिंग करीब दो साल पहले होने की बात सामने आ रही है। इसके बाद सड़क और पुल-पुलियों की स्थिति को लेकर कोई प्रभावी मरम्मत नहीं की गई।
नतीजा सामने है—बारिश आई और पुल बह गया।
गरियाबंद जिले में बारिश के दौरान पहले भी PMGSY से जुड़े मार्गों और पुलों के क्षतिग्रस्त होने से ग्रामीण संपर्क प्रभावित होने की खबरें सामने आई हैं। सितंबर में बिंद्रानवागढ़-सातधार मार्ग पर पुराना रपटा पुल क्षतिग्रस्त होने से कई गांवों का संपर्क प्रभावित हुआ था।
स्कूल और आंगनबाड़ी तक पहुंच पर भी संकट
यह मामला सिर्फ सड़क टूटने तक सीमित नहीं है। पाटियालपारा में मिडिल स्कूल और आंगनबाड़ी संचालित होती है।
ऐसे में पुल बहने के बाद सबसे बड़ा सवाल बच्चों की सुरक्षा और उनकी नियमित आवाजाही को लेकर है। बरसात में नाले का जलस्तर बढ़ने पर इसी रास्ते से गुजरना किसी खतरे से कम नहीं।
एक तरफ सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने का दावा करती है, दूसरी तरफ जमीनी तस्वीर यह है कि बारिश आते ही कई गांवों की सड़कें और पुल-पुलियां जवाब देने लगती हैं।
गरियाबंद में हालिया बारिश के दौरान भी कई नदी-नाले उफान पर आने और ग्रामीण मार्ग बाधित होने की रिपोर्ट सामने आई थी।
खरीफ की कटाई के समय किसानों पर दोहरी मार
इस समय क्षेत्र में खरीफ फसलों की कटाई का काम चल रहा है। किसानों के लिए यह साल का सबसे महत्वपूर्ण समय है। खेत से फसल निकालकर घर और बाजार तक पहुंचाना जरूरी है, लेकिन सड़क और पुल की हालत ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है।
रास्ता खराब होने के कारण किसानों को अपनी फसल और कृषि सामग्री के आवागमन में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। आरोप है कि जब विभागीय अमला मौके पर नहीं पहुंचा तो ग्रामीणों और किसानों को खुद ही रास्ते की मरम्मत करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
यानी जिस सड़क और पुल की मरम्मत की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की है, उसकी जिम्मेदारी अब ग्रामीण अपने स्तर पर उठाने को मजबूर हैं।
किसान खुद बना रहे रास्ता, विभाग कहां है?
यह तस्वीर सरकारी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा सवाल है।
क्या विभाग को पुल बहने की जानकारी नहीं है?
क्या PMGSY मार्ग की निगरानी सिर्फ कागजों तक सीमित है?
करीब दो साल से मरम्मत नहीं हुई तो सड़क की स्थिति की जांच किसने की?
बारिश से पहले पुल-पुलिया का निरीक्षण क्यों नहीं किया गया?
करीब 700 ग्रामीणों की परेशानी दूर करने मौके पर जिम्मेदार अधिकारी कब पहुंचेंगे?
ग्रामीणों की समस्या यह नहीं है कि बारिश हुई। बारिश प्राकृतिक घटना है। सवाल यह है कि बारिश के बाद ग्रामीणों को अपने हाल पर क्यों छोड़ दिया गया?
कागजों में सड़क, जमीन पर बह गया रास्ता!
PMGSY जैसी योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर और बारहमासी सड़क संपर्क उपलब्ध कराना है। लेकिन पीपलखुटा क्षेत्र की मौजूदा स्थिति इस व्यवस्था की जमीनी निगरानी पर सवाल खड़े करती है।
सड़क बनी, रिपेयरिंग हुई और फिर बारिश में पुल बह गया—तो अब जवाबदेही किसकी है?
ग्रामीणों को तत्काल राहत देने के लिए सिर्फ मिट्टी डालकर या अस्थायी रास्ता बनाकर खानापूर्ति पर्याप्त नहीं होगी। बह चुके पुल की तकनीकी जांच, स्थायी मरम्मत और पूरे मार्ग की गुणवत्ता की जांच जरूरी है।
अब कार्रवाई का इंतजार
ग्रामीणों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से मांग की है कि मौके पर अधिकारियों की टीम भेजकर स्थिति का तत्काल निरीक्षण कराया जाए। पटेलपारा-पीपलखुटा नाला पर क्षतिग्रस्त पुल को जल्द बहाल किया जाए और लोहारपारा नाला समेत पूरे धनौरा-पाटियालपारा मार्ग की स्थिति की जांच कर आवश्यक मरम्मत कराई जाए।
खासकर किसानों की खरीफ फसल की कटाई को देखते हुए रास्ते को तत्काल आवागमन योग्य बनाना जरूरी है।
अब देखने वाली बात यह है कि ग्रामीणों द्वारा खुद रास्ता सुधारने की नौबत आने के बाद विभाग जागता है या फिर यह सड़क और पुल-पुलिया भी सरकारी फाइलों में मरम्मत का इंतजार करते रहेंगे।





