21 साल पुराने स्कूल भवन की हालत बदहाल, दीवारों में दरारें और छत भी जर्जर; हादसे का खतरा
गरियाबंद। जिले में शिक्षा व्यवस्था को लेकर आए दिन सवाल उठते रहे हैं। सरकार बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित वातावरण देने के दावे करती है, लेकिन ग्रामीण अंचलों के कई स्कूलों की जमीनी तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती नजर आती है। ऐसा ही मामला गरियाबंद जिले के ग्राम पंचायत खरीपथरा से सामने आया है, जहां प्राथमिक शाला का भवन लंबे समय से बदहाली का शिकार है।
स्कूल की छत जर्जर हो चुकी है और कभी भी गिरने का खतरा बना हुआ है। वहीं स्कूल के फर्श की हालत भी बेहद खराब है। फर्श में बड़ी सुरंगनुमा जगह बन चुकी है, जबकि दीवारों में जगह-जगह दरारें नजर आने लगी हैं। ऐसे जर्जर भवन में छोटे-छोटे बच्चों की कक्षाएं संचालित होना उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
फर्श में बड़ी सुरंग, नीचे से खोखला हो चुका हिस्सा
स्कूल भवन के फर्श को देखकर स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। फर्श का एक बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर सुरंगनुमा रूप ले चुका है। ऐसे में बच्चों के पैर फिसलने या फर्श का कमजोर हिस्सा और धंसने का खतरा बना हुआ है।
एक तरफ जर्जर छत बच्चों के सिर पर खतरा बनी हुई है, तो दूसरी तरफ नीचे का फर्श भी सुरक्षित नहीं है। दीवारों में आई दरारें भवन की मजबूती पर अलग सवाल खड़े कर रही हैं।
162 बच्चों की पढ़ाई, लेकिन सुरक्षित स्कूल भवन नहीं
जानकारी के अनुसार खरीपथरा में संचालित प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला को मिलाकर करीब 162 बच्चे अध्ययनरत हैं। यानी बड़ी संख्या में बच्चे रोज इसी परिसर में पढ़ाई करने पहुंचते हैं।
बच्चों के लिए स्कूल उनका दूसरा घर माना जाता है, लेकिन जब उसी स्कूल भवन की छत, फर्श और दीवारें सुरक्षित नहीं हों तो अभिभावकों की चिंता स्वाभाविक है।
गरियाबंद जिले में इससे पहले भी जर्जर स्कूल भवनों के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने के मामले सामने आ चुके हैं।
2005 में हुई थी स्कूल की स्थापना, 21 साल बाद भी नए भवन का इंतजार
ग्रामीणों के अनुसार खरीपथरा में स्कूल की स्थापना वर्ष 2005 में की गई थी। अब स्कूल को करीब 21 वर्ष पूरे होने को हैं, लेकिन इसके बावजूद नए स्कूल भवन की स्वीकृति नहीं मिलने की बात सामने आ रही है।
सवाल यह है कि जब पुराना भवन लगातार जर्जर होता जा रहा है और उसमें बच्चों की सुरक्षा को लेकर खतरा दिखाई दे रहा है, तो नए भवन के लिए अब तक ठोस पहल क्यों नहीं हुई?
क्या कहते हैं अधिकारी?
इस संवेदनशील मामले को लेकर जब जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) राजेश चंद्राकर से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने मामले को संज्ञान में लेते हुए संक्षिप्त प्रतिक्रिया दी।
DEO राजेश चंद्राकर ने कहा—
“मैं इस स्कूल को दिखवा लेता हूं।”
अधिकारी के इस बयान के बाद अब उम्मीद है कि स्कूल भवन की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कराया जाएगा और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
हादसे का इंतजार या पहले होगी कार्रवाई?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन किसी अप्रिय घटना के बाद कार्रवाई करेगा या उससे पहले ही बच्चों को सुरक्षित भवन उपलब्ध कराया जाएगा?
जर्जर छत, फर्श में बनी बड़ी सुरंग और दीवारों में दरारों के बीच 162 बच्चों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जरूरत है कि संबंधित विभाग स्कूल भवन का तत्काल तकनीकी निरीक्षण कराए और यदि भवन असुरक्षित है तो बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के साथ नए भवन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए।
क्योंकि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक है, जब बच्चों को पढ़ने के लिए सुरक्षित स्कूल भवन भी मिले।
अब देखना होगा कि DEO के “स्कूल को दिखवा लेता हूं” वाले आश्वासन के बाद खरीपथरा के स्कूल की तस्वीर बदलती है या फिर बच्चे इसी जर्जर भवन में पढ़ने को मजबूर रहते हैं।





