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    अमित शाह की ‘डेडलाइन’ और बस्तर-सुकमा का कड़वा सच—क्या कागजी जीत से पेट भरेगा?

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    अमित शाह की ‘डेडलाइन’ और बस्तर-सुकमा का कड़वा सच—क्या कागजी जीत से पेट भरेगा?

    अमित शाह का संकल्प और 31 मार्च की डेडलाइन: क्या वाकई खत्म हुआ 'लाल आतंक'?
    Radheshyam PatelBy Radheshyam Patel31/03/2026
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    रायपुर/बस्तर: आज 31 मार्च 2026 है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ समय पहले हुंकार भरी थी कि “31 मार्च 2026 तक भारत नक्सलवाद की समस्या से पूरी तरह मुक्त होगा।” आज उस समयसीमा के अंतिम दिन, छत्तीसगढ़ सरकार ने ‘नक्सल मुक्त’ होने का ऐलान तो कर दिया है, लेकिन क्या सुकमा के सिलगेर, बीजापुर के तर्रेम और बस्तर के अबूझमाड़ में भी वही उत्साह है जो दिल्ली के गलियारों में है?

    1. अमित शाह का संकल्प: मिशन 2026 की सफलता या आधा सच?

    अमित शाह ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाते हुए सुरक्षा बलों को खुली छूट दी थी। विजयवाड़ा में 20 लाख के इनामी माओवादी नेता सोमन्ना का सरेंडर इसी दबाव का नतीजा माना जा रहा है।

    • सरकारी दावा: गृह मंत्रालय के अनुसार, नक्सली अब केवल कुछ पॉकेट्स तक सीमित हैं और उनका संगठित ढांचा ध्वस्त हो चुका है।

    • जमीनी सवाल: क्या बंदूकें शांत होने का मतलब शांति है? अमित शाह के “नक्सल मुक्त भारत” के सपने में बस्तर के उस अंतिम आदिवासी का स्थान कहाँ है, जिसे आज भी बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हैं?

    2. सुकमा और बीजापुर: जहाँ सड़कें ‘खूनी’ हैं और वादे ‘खोखले’

    सरकार ने डेडलाइन तो पूरी कर ली, लेकिन सुकमा और बीजापुर के कई अंदरूनी इलाकों में आज भी ‘विकास’ के नाम पर केवल सुरक्षा कैंप पहुंचे हैं।

    • सड़कों का सच: जगरगुंडा से बासागुड़ा के बीच की सड़कें आज भी इस बात की गवाह हैं कि यहाँ विकास केवल फाइलों में दौड़ रहा है। करोड़ों के टेंडर पास होते हैं, लेकिन धरातल पर आदिवासियों को केवल धूल और गड्ढे ही मिलते हैं।

    • शिक्षा की स्थिति: सुकमा के उन ‘पोर्टा केबिन’ स्कूलों की हालत देखिए, जहाँ बच्चों को भविष्य की शिक्षा तो दी जा रही है, लेकिन व्यवस्थाएं आज भी जर्जर हैं। क्या नक्सलवाद खत्म होने से इन स्कूलों की दीवारें रातों-रात मजबूत हो जाएंगी?

    3. अबूझमाड़: ‘अज्ञात’ से ‘अपेक्षित’ तक का लंबा सफर

    नारायणपुर का अबूझमाड़, जिसे कभी नक्सलियों की सुरक्षित पनाहगाह कहा जाता था, आज भी प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है।

    • अधिकारों की लड़ाई: यहाँ के आदिवासियों के पास आज भी अपनी जमीन के पट्टे नहीं हैं। सरकार ने ‘नक्सल मुक्त’ की घोषणा तो कर दी, लेकिन क्या इन आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकारों से लैस किया गया?

    • स्वास्थ्य सेवा का अभाव: बीजापुर और सुकमा के सुदूर गांवों में आज भी एम्बुलेंस नहीं पहुँचती। जब तक गर्भवती महिलाओं को खाट पर लादकर मीलों पैदल चलना पड़ेगा, तब तक दिल्ली के दावों पर सवाल उठते रहेंगे।

    4. क्या हिड़मा और विचारधारा सच में खत्म हो गए?

    सुरक्षाबलों ने सोमन्ना जैसे बड़े चेहरों को सरेंडर कराकर एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत हासिल की है। लेकिन बस्तर के जानकार जानते हैं कि नक्सलवाद केवल बंदूक का नाम नहीं, बल्कि एक ‘अभाव’ से उपजी विचारधारा है।

    • मौन का खतरा: अमित शाह की रणनीति ने नक्सलियों को पीछे हटने पर मजबूर जरूर किया है, लेकिन हिड़मा जैसे खूंखार कमांडर अगर ‘मौन’ हैं, तो यह और भी खतरनाक हो सकता है।

    • धोखा या विकास: यदि बस्तर के युवाओं को रोजगार और सम्मान नहीं मिला, तो वे फिर से पुराने रास्ते पर जा सकते हैं। विकास के नाम पर संसाधनों का दोहन हुआ, तो यह शांति अस्थायी साबित होगी।

    • अमित शाह की चुनौती अब शुरू होती है

    31 मार्च 2026 की यह डेडलाइन एक मील का पत्थर हो सकती है, लेकिन बस्तर, सुकमा और बीजापुर की जनता के लिए यह केवल एक और तारीख है।

    • फाइलों का जाल: जब तक सुकमा के अंतिम गांव तक शुद्ध पीने का पानी और बीजापुर के हर घर में बिजली नहीं पहुँचती, तब तक ‘नक्सलवाद का खात्मा’ केवल एक सियासी हेडलाइन बनकर रह जाएगा।

    • असली जीत: जीत तब होगी जब गृह मंत्री का ‘संकल्प’ बस्तर के आदिवासी की ‘समृद्धि’ में तब्दील होगा। वरना, कागजी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच की यह खाई लोकतंत्र को कमजोर ही करेगी।

     “क्या आपको लगता है कि सिर्फ हथियार डाल देने से बस्तर की समस्या हल हो जाएगी?” 

    Radheshyam Patel
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