गरियाबंद। जो पानी गरियाबंद जिले के खेतों की प्यास बुझाने और लोगों का जीवन संवारने के लिए था, वह अब सियासी और प्रशासनिक फैसलों की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। जिले की ‘जीवनदायिनी’ माने जाने वाले सिकासार जलाशय (Shikasasar Dam) का पानी अब पड़ोसी जिले महासमुंद की ओर मोड़ा जा रहा है। वर्षों से जिस पानी के लिए स्थानीय लोग तरसते रहे, उसे दूसरे जिले को सौंपने के इस फैसले ने पूरे गरियाबंद में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।

हैरानी की बात यह है कि जब स्थानीय लोगों और किसानों ने इस पर सवाल उठाए, तो जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की ओर से बेतुका तर्क दिया गया कि—“बरसात में उलट का पानी देंगे।” यह तर्क अपने आप में हास्यास्पद है, क्योंकि बरसात के मौसम में तो वैसे भी नदियों और प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी लबालब रहता है। ऐसे में ‘बरसात में पानी देने’ का लॉजिक किसी के गले नहीं उतर रहा है।
करोड़ों की नहरें, फिर भी खेत सूखे
ज्ञात हो कि शिकासार बांध क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों की जीवनरेखा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से उन्हें इस बांध का पर्याप्त लाभ नहीं मिला है। खेती, पेयजल और दैनिक उपयोग के लिए यहां पानी की समस्या हमेशा बनी रहती है। विडंबना देखिए कि इस सिकासार के पानी को स्थानीय किसानों तक पहुंचाने के लिए नहर-नाली के निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन घटिया निर्माण और उचित प्लानिंग न होने की वजह से आज तक निचले हिस्से के गांवों तक पानी पहुंच ही नहीं पाया है।
प्रशासन का दोहरा रवैया: गर्मी में फरमान, अब मेहरबानी
किसानों का साफ कहना है कि जब खुद गरियाबंद में गर्मी के दिनों में जलसंकट गहराता है, तब यही प्रशासन और जनप्रतिनिधि पानी की कमी का हवाला देते हुए ‘रबी फसल’ (Rabi Crop) के लिए पानी न देने का सख्त फरमान लागू कर देते हैं। लेकिन अब जब उसी बांध का पानी दूसरे जिले (महासमुंद) को भेजा जा रहा है, तो प्रशासन का यह दोहरा रवैया खुलकर सामने आ गया है।
किसानों और आम लोगों में भड़का जनाक्रोश

इस पूरे मामले को लेकर क्षेत्र में जनाक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। किसानों का कहना है कि एक तरफ वे सिंचाई की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं, और दूसरी ओर उनके हक का पानी राजनीतिक दबाव में दूसरे जिले को बांटा जा रहा है। ग्रामीणों ने इसे “स्थानीय हितों की खुली अनदेखी” करार दिया है।
जनता पूछ रही है ये तीखे सवाल:
जब गरियाबंद में ही पानी की भारी कमी है, तो महासमुंद को पानी क्यों दिया जा रहा है?
बरसात में पानी देने का तर्क कितना व्यावहारिक है, क्या इसका कोई तकनीकी आधार है?
क्या स्थानीय जनता की जरूरतों और उनके भविष्य का कोई आकलन किया गया है?
क्या इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले स्थानीय किसानों से कोई जनसहमति ली गई थी?
सिकासार बांध का पानी अब सिर्फ एक जलस्रोत का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद का रूप ले चुका है। जहां एक ओर गरियाबंद की जनता अपने हक के लिए लामबंद हो रही है, वहीं जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और बेतुके बयानों ने आग में घी डालने का काम किया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस बढ़ते जनाक्रोश को कैसे शांत करता है और क्या गरियाबंद के किसानों को उनका छीना जा रहा हक वापस मिल पाता है या नहीं।


