बीमार आवारा कुत्तों से दहशत, प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल ग्रामीणों में फैल सकती है बीमारी

गरियाबंद । जिले के अमलीपदर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों लोग किसी जंगली जानवर से नहीं, बल्कि बीमार आवारा कुत्तों से फैली दहशत के साये में जीने को मजबूर हैं।
कई कुत्तों के शरीर से झड़ते बाल, त्वचा पर मोटी पपड़ी और लाल-सफेद धब्बे साफ़ तौर पर किसी संक्रामक बीमारी की ओर इशारा कर रहे हैं, जिससे आम लोगों में भय का माहौल बन गया है।
स्थानीय नागरिकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह बीमारी इंसानों तक भी फैल सकती है?

बीमारी से ज्यादा डर, सरकारी उदासीनता का
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें बीमारी से उतना डर नहीं है, जितना प्रशासन की चुप्पी से। शिकायतें की जा रही हैं, जानकारी दी जा रही है, लेकिन अब तक न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही किसी अधिकारी ने स्थिति को गंभीरता से लिया। लोगों का आरोप है कि मामला “आवारा कुत्तों” से जुड़ा होने के कारण इसे जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।

भवन है, बोर्ड है… लेकिन डॉक्टर नहीं
अमलीपदर में पशु चिकित्सालय मौजूद है
भवन खड़ा है, नाम का बोर्ड भी लगा है, लेकिन स्थायी पशु चिकित्सक की तैनाती नहीं है। ग्रामीण वर्षों से पशु चिकित्सक की मांग कर रहे हैं, मगर यह मांग फाइलों तक सिमट कर रह गई है। इलाज के अभाव में न सिर्फ आवारा पशु, बल्कि पालतू जानवर भी खतरे में हैं।

मोबाइल वेटनरी यूनिट पर भी भरोसा नहीं
हालांकि कभी-कभार मोबाइल वेटनरी हेल्थ यूनिट क्षेत्र में पहुंचती है, लेकिन इसकी अनियमितता के कारण ग्रामीणों का भरोसा टूट चुका है। बीमारी रोज़ फैल रही है और इलाज कभी-कभार—ऐसे में संक्रमण पर नियंत्रण कैसे होगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
डॉक्टर की राय _ बीमारी साधारण, इलाज पूरी तरह संभव
पशु चिकित्सक डॉ. विभीषण कश्यप के अनुसार यह समस्या स्किन वॉर्मिंग / एलर्जिक डिसऑर्डर से जुड़ी है।
उन्होंने बताया कि—
सही दवाइयों,समय पर इंजेक्शन
और एंटी-एलर्जी उपचार से यह बीमारी पूरी तरह ठीक की जा सकती है।
लेकिन विडंबना यह है कि दवा और ज्ञान तो है, पर इलाज करने वाला कोई नहीं।
अब पालतू कुत्ते भी चपेट में स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब यह बीमारी अब घरों में पाले जाने वाले कुत्तों तक पहुंचने लगी है। यानी खतरा अब सड़कों से निकलकर सीधे घरों की चौखट तक आ चुका है।
इसके बावजूद न तो पशुधन विभाग सक्रिय दिख रहा है और न ही कोई सामाजिक संगठन मैदान में उतरता नज़र आ रहा है।
संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही बीमारी किसी इंसान, गाय या अन्य पशुओं में फैली होती, तो शायद अब तक बैठकें हो चुकी होतीं और टीमें तैनात कर दी जातीं।
लेकिन मामला कुत्तों का है, इसलिए न संवेदना दिख रही है और न ही तत्परता।
सवाल साफ है—
अगर कल यह बीमारी इंसानों तक पहुंची, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? बीमार कुत्तों की या उस सिस्टम की, जो आज भी चुप्पी साधे बैठा है?

